एक गाँव के बाहर बने
शिवमंदिर मे चार-पाँच गंजेडी रोज गाँजा पीते थे,
😛
शिवमंदिर मे चार-पाँच गंजेडी रोज गाँजा पीते थे,
पिछले कई साल से जब भी वो गाँजा पीते थे तब "बम भोले" का जयकारा करते थे
चिल्लम की हर फुँक के साथ,
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एक दिन खुद शिव जी उनके इस भक्ति माध्यम से प्रसन्न हो गये,
.
वो एक साधारण मनुष्य के रूप मे उन गंजेडीयो के पास आ कर बैठ गये,
.
गंजेडीयो ने चिल्लम बनाना शुरू किया तो एक गंजेडी ने शिव जी को
गाँजा आफर किया,
.
प्रायः गंजेडीयो मे मेहमानवाजी बडे उच्च स्तर की होती है,
इसलिए गंजेडीयो ने पहला चिल्लम
भोलेनाथ को ही दिया,
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एक फुँक मे ही शिव जी ने पुरा चिल्लम खाली कर दिया ,
गंजेडीयो को लग गया कि ये कोई उच्च कोटी का पीने वाला है,
फिर
उन्होने दुसरा चिल्लम बनाया
और फिर पहला मौका भोलेनाथ को दिया
,
शिव जी ने फिर एक फुँक मे ही पुरा चिल्लम खाली कर दिया,
.
हर फुँक के बाद एक गंजेडी, भोलेनाथ से पुछता रहा :
"नशा आया" ?
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जवाब मे शिव जी केवल मुस्कुरा के 'ना' मे सर हिला देते,
.
ऐसे कर के जब पाँच चिल्लम खाली हो गये तो
गंजेडी आखिरी चिल्लम भरने लगे तभी उनमे से एक
गंजेडी ने पुछा : " क्यों अभी भी नशा नही हुआ ? "
.
तब शिव जी ने कहा : "जानते हो मै कौन हुँ ?"
.
गंजेडी : "कौन हो भाऊ ? "
.
शिव जी : " मै इस ससांर का सहाँरक, सभी भुत, प्रेत,
यक्ष, असुर, गंधर्व का स्वामी, ब्रम्हाड का
आदिवासी, हिमालय का निवासी हुँ,
आदि अंत - प्रारंभ, नाश और नशा सब की सीमा मुझसे प्रारंभ होती है और मुझ पर ही खत्म, शकंर नाम है मेरा,
जिसको तुम लोग रोज याद करते हो "
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गंजेडी जोर से चिल्लाया : " अब इसको और चिल्लम मत देना बे , गाँजा चढ गया इसको
😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜😜
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